भूतग्राम: स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते |
रात्र्यागमेऽवश: पार्थ प्रभवत्यहरागमे || 19||
भूत-ग्रामः-असंख्य जीव; सः-ये; एव–निश्चय ही; अयम्-यह; भूत्वा बारम्बार जन्म लेना; प्रलीयते-विलीन हो जाता है; रात्रि-आगमे-रात्रि होने पर; अवशः-असहाय; पार्थ-पृथापुत्र, अर्जुनः प्रभवति-प्रकट होता है; अहः-दिन; आगमे-दिन के आरम्भ में।
BG 8.19: ब्रह्मा के दिन के आरंभ में असंख्य जीव पुनः जन्म लेते हैं और ब्रह्माण्डीय रात्रि होने पर विलीन हो जाते हैं।
भूतग्राम: स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते |
रात्र्यागमेऽवश: पार्थ प्रभवत्यहरागमे || 19||
ब्रह्मा के दिन के आरंभ में असंख्य जीव पुनः जन्म लेते हैं और ब्रह्माण्डीय रात्रि होने पर विलीन हो जाते …
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वेदों में चार प्रकार के प्रलय का उल्लेख किया गया है-
नित्य प्रलय: हमारी चेतना का प्रतिदिन का प्रलय तब होता है जब हम गहन निद्रा में होते हैं।
नैमित्तिक प्रलयः यह प्रलय महर्लोक तक के सभी लोकों में ब्रह्मा का दिन समाप्त होने पर आती है। उस समय इन लोकों में रहने वाली आत्माएँ अव्यक्त हो जाती हैं। वे प्रसुप्त अवस्था में महा विष्णु के उदर में समा जाती हैं। जब ब्रह्मा इन लोकों की सृष्टि करते हैं तब वे अपने पूर्व कर्मों के अनुसार जन्म लेती हैं।
महाप्रलयः ब्रह्मा के जीवनकाल की समाप्ति पर सभी ब्रह्माण्डों में होने वाले संहार को महाप्रलय कहा जाता है। उस समय ब्रह्माण्ड की सभी जीवात्माएँ महाविष्णु के उदर में प्रसुप्त अवस्था में चली जाती हैं। उनके स्थूल और सूक्ष्म शरीर का विनाश हो जाता है और उनका कारण शरीर शेष रहता है। जब सृष्टि के अगले चक्र का सृजन होता है तब उनके कारण शरीर में संचित उनके कर्मों और संस्कारों के अनुसार उन्हें पुनः जन्म मिलता है।
आत्यन्तिक प्रलयः जब आत्मा अंततः भगवान को प्राप्त कर लेती है तब वह सदा के लिए जीवन और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाती है। आत्यन्तिक प्रलय माया के बंधनों का विनाश है जो आत्मा को नित्य बाँधे रखती थी।